प्रकाशित समय : सुबह
पश्चिम एशिया में भड़की जंग की लपटें अब ग्रेटर नोएडा के औद्योगिक क्षेत्र तक पहुंच गई हैं। अमेरिका और इजराइल द्वारा 28 फरवरी 2026 को ईरान पर किए गए संयुक्त हमलों के बाद भड़के इस युद्ध ने वैश्विक व्यापार की कमर तोड़ दी है। होर्मुज़ जलडमरूमध्य की नाकेबंदी और शिपिंग मार्गों पर संकट के चलते ग्रेटर नोएडा के निर्यातक और आयातक दोनों ही बुरी तरह प्रभावित हो रहे हैं।
युद्ध की पृष्ठभूमि
28 फरवरी 2026 को अमेरिका और इजराइल ने “ऑपरेशन एपिक फ्यूरी” और “ऑपरेशन रोअरिंग लायन” के तहत ईरान पर हमला किया, जिसमें ईरानी सुप्रीम लीडर अली खामेनेई मारे गए। इसके जवाब में ईरान ने होर्मुज़ जलडमरूमध्य को बंद कर दिया और खाड़ी देशों में स्थित अमेरिकी ठिकानों पर मिसाइल हमले किए। इस युद्ध ने दुनिया के 20% से अधिक तेल आपूर्ति मार्ग को खतरे में डाल दिया है।

होर्मुज़ की नाकेबंदी — ग्रेटर नोएडा तक असर
होर्मुज़ जलडमरूमध्य से रोजाना करीब 2.1 करोड़ बैरल तेल गुजरता था। ईरान द्वारा इस रास्ते को बंद करने के बाद मर्सक और हापाग-लॉयड जैसी बड़ी शिपिंग कंपनियों ने अपने जहाज अफ्रीका के केप ऑफ गुड होप के रास्ते मोड़ दिए हैं। इससे एशिया-यूरोप शिपमेंट में 10 से 15 दिन की अतिरिक्त देरी हो रही है। ग्रेटर नोएडा के निर्यातक, जो यूरोप और मध्य पूर्व को माल भेजते हैं, उन्हें इस देरी की सबसे बड़ी मार झेलनी पड़ रही है।
माल फंसा, भुगतान अटका
ग्रेटर नोएडा के कई उद्यमियों का कार्गो या तो बंदरगाहों पर फंसा है या समुद्र में रास्ता बदलने को मजबूर है। निर्यातकों के सामने सबसे बड़ी समस्या यह है कि लेटर ऑफ क्रेडिट की समय-सीमा में दस्तावेज़ जमा नहीं हो पा रहे, जिससे उनकी नकदी का प्रवाह (लिक्विडिटी) बुरी तरह प्रभावित हो रहा है। एपैरल एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल के अध्यक्ष ए. सक्थिवेल ने नागरिक उड्डयन मंत्रालय को पत्र लिखकर उड़ान व्यवधान के कारण अटके एक्सपोर्ट कार्गो पर डेमरेज चार्ज माफ करने की मांग की है।
कच्चे तेल की कीमतें आसमान पर, उत्पादन लागत बढ़ी
ब्रेंट क्रूड ऑयल 2 मार्च को 82.37 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया — जनवरी 2025 के बाद का सबसे ऊंचा स्तर। भारत अपनी 80% से अधिक कच्चे तेल की जरूरत आयात से पूरी करता है, जिसमें 40% से अधिक होर्मुज़ से होकर आता था। ग्रेटर नोएडा की मैन्युफैक्चरिंग इकाइयों — चाहे वो इलेक्ट्रॉनिक्स हों, ऑटो पार्ट्स हों या टेक्सटाइल — सभी की उत्पादन लागत पेट्रोलियम उत्पादों की कीमत से सीधे जुड़ी है। तेल महंगा होने से ट्रांसपोर्टेशन, प्लास्टिक कच्चा माल और ऊर्जा लागत — तीनों एक साथ बढ़ रहे हैं।
शिपिंग बीमा 50% तक महंगा
युद्ध के चलते समुद्री बीमा प्रीमियम में 50% तक की वृद्धि हो चुकी है। कई प्रमुख बीमा कंपनियों ने 5 मार्च 2026 से युद्ध जोखिम कवरेज बंद कर दी है। इससे ग्रेटर नोएडा के निर्यातकों की लागत और बढ़ गई है, जो पहले से ही माल की ढुलाई में देरी और अनिश्चितता का सामना कर रहे हैं।
रुपये पर दबाव, आयात और महंगा
HDFC बैंक ने चेतावनी दी है कि क्रूड में प्रति 10 डॉलर की वृद्धि भारत के चालू खाता घाटे को 40 से 50 आधार अंक तक बढ़ा सकती है और रुपये पर दबाव डाल सकती है। ग्रेटर नोएडा की उन इकाइयों के लिए जो चीन या पश्चिमी देशों से कच्चा माल आयात करती हैं, रुपये की कमज़ोरी आयात लागत को और बढ़ा देगी — जिससे मुनाफे का मार्जिन सिकुड़ता जा रहा है।
खाड़ी देशों को निर्यात पर संकट, रमज़ान में बड़ा नुकसान
खाड़ी देश ग्रेटर नोएडा की कई इकाइयों के लिए प्रमुख बाजार हैं। रमज़ान और ईद के त्योहारी सीज़न में खाड़ी देशों को भेजे जाने वाले नाशवान सामान अब खतरे में हैं। UAE, कतर, कुवैत जैसे देशों में हवाई क्षेत्र बंद होने और उड़ानें रद्द होने से एयर कार्गो भी प्रभावित हुआ है। Air India सहित IndiGo ने मध्य पूर्व की कई उड़ानें निलंबित कर दी हैं।
प्रवासी भारतीयों का रेमिटेंस भी खतरे में
खाड़ी देशों में काम करने वाले लगभग 90 लाख भारतीयों पर मंडराते खतरे से रेमिटेंस पर भी असर पड़ सकता है। खाड़ी से आने वाला रेमिटेंस भारत के कुल विदेशी प्रेषण का 38% है — यानी करीब 51,400 करोड़ डॉलर। S&P के विशेषज्ञों के अनुसार, अगर युद्ध 6 महीने से अधिक खिंचा तो भारत की अर्थव्यवस्था पर इसका गहरा असर पड़ेगा।
सरकार की नज़र, उद्योगों को उम्मीद
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2 मार्च 2026 की रात कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्युरिटी (CCS) की आपात बैठक बुलाकर समुद्री मार्गों, कच्चे तेल की आपूर्ति और पश्चिम एशिया में भारतीयों की सुरक्षा पर चर्चा की। वाणिज्य मंत्रालय ने भी समय-संवेदनशील निर्यात क्षेत्रों के लिए विशेष समन्वय और वास्तविक समय निगरानी की व्यवस्था शुरू की है।
ग्रेटर नोएडा के उद्योगपति सरकार से माल ढुलाई पर सब्सिडी, बीमा राहत और वैकल्पिक व्यापार मार्गों की व्यवस्था की मांग कर रहे हैं।
आगे की राह
विशेषज्ञों के अनुसार अगर युद्ध अगले चार हफ्तों में थम जाता है तो कच्चे तेल की कीमतें और शिपिंग मार्ग सामान्य हो सकते हैं। लेकिन अगर संघर्ष एक से छह महीने तक चला तो वैश्विक मुद्रास्फीति, ऊर्जा की ऊंची कीमतें और आपूर्ति श्रृंखला का बिखराव — ग्रेटर नोएडा जैसे औद्योगिक केंद्रों के लिए दीर्घकालिक चुनौती बन सकता है।
खुशालाल प्रजापति द्वार लिखा गया।
स्वतंत्र समाचार प्रकाशक जो वैश्विक मामलों, आपूर्ति श्रृंखलाओं और सार्वजनिक नीति पर ध्यान केंद्रित करता है – और सब कुछ सत्यापित रिपोर्टिंग के साथ!
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