भारत और ईरान के बीच पांच साल से ज्यादा समय से बंद पड़ा भारत-ईरान तेल व्यापार एक बार फिर शुरू होने जा रहा है। 2019 के बाद यह पहली बार है जब ईरानी कच्चा तेल भारत आ रहा है।
कमोडिटी मार्केट एनालिटिक्स फर्म Kpler के अनुसार, अफ्रामैक्स टैंकर ‘पिंग शुन’ (IMO: 9231901) ईरान के खार्ग द्वीप से लगभग 6 लाख बैरल कच्चा तेल लेकर निकला है। यह टैंकर वर्तमान में गुजरात के वाडिनार बंदरगाह की ओर बढ़ रहा है। इस टैंकर के 4 अप्रैल 2026 तक भारत पहुंचने का अनुमान है।
भारत-ईरान तेल व्यापार में अमेरिकी छूट की भूमिका
इस ऐतिहासिक व्यापार के पुनः शुरू होने का मुख्य कारण अमेरिकी प्रशासन द्वारा दी गई 30-दिन की अस्थायी छूट है। पश्चिम एशिया में जारी अमेरिका-इजरायल-ईरान संघर्ष के कारण वैश्विक तेल कीमतों में भारी उछाल आया है।
कीमतों को काबू करने के लिए अमेरिका ने 19 अप्रैल 2026 तक समुद्र में मौजूद ईरानी तेल की खरीद पर प्रतिबंध में ढील दी है।

गुजरात के वाडिनार बंदरगाह का महत्व
Kpler के वरिष्ठ रिसर्च एनालिस्ट सुमित रितोलिया ने बताया कि मई 2019 के बाद यह पहला मौका है जब किसी टैंकर ने वाडिनार को अपनी मंजिल घोषित किया है। यह डिलीवरी ऐसे समय हो रही है जब भारतीय रिफाइनर कच्चे तेल की घटती इन्वेंट्री का सामना कर रहे हैं।
वाडिनार गुजरात का एक प्रमुख ऊर्जा केंद्र है। यहाँ नयारा एनर्जी (रोसनेफ्ट समर्थित) की 2 करोड़ टन प्रति वर्ष क्षमता वाली विशाल रिफाइनरी स्थित है। यह बंदरगाह बीना रिफाइनरी (BPCL) जैसी अंतर्देशीय इकाइयों के लिए भी कच्चे तेल की आपूर्ति का प्रमुख केंद्र है।
भारत-ईरान तेल व्यापार का इतिहास और आंकड़े
भारत कभी ईरानी कच्चे तेल के प्रमुख खरीदारों में से एक था। ईरान लाइट और ईरान हेवी ग्रेड का तेल भारतीय रिफाइनरियों के लिए तकनीकी रूप से अनुकूल और प्रतिस्पर्धी था। एक समय भारत के कुल तेल आयात में ईरान की हिस्सेदारी 11.5 प्रतिशत तक थी। नीचे व्यापार का संक्षिप्त इतिहास दिया गया है:
- 2018: भारत प्रतिदिन लगभग 5.18 लाख बैरल ईरानी तेल आयात करता था।
- जनवरी–मई 2019: आयात घटकर लगभग 2.68 लाख बैरल प्रतिदिन रह गया।
- मई 2019: अमेरिकी प्रतिबंधों के चलते आयात पूरी तरह से बंद हो गया।
- 2026: 7 साल बाद पहली बार व्यापार पुनः शुरू होने की संभावना है।
समुद्र में मौजूद तेल और भुगतान की चुनौती
Kpler के आंकड़ों के अनुसार, वर्तमान में समुद्री जहाजों पर करीब 9.5 करोड़ बैरल ईरानी तेल मौजूद है। इसमें से लगभग 5.1 करोड़ बैरल भारतीय रिफाइनरियों के लिए उपयुक्त है। शेष तेल चीन और दक्षिण-पूर्व एशियाई बाजारों के लिए अधिक अनुकूल है।
इस व्यापार में सबसे बड़ी बाधा भुगतान तंत्र की बनी हुई है। ईरान अभी भी अंतरराष्ट्रीय बैंकिंग नेटवर्क SWIFT से बाहर है। 2012 में यूरोपीय संघ और 2018 में अमेरिका के प्रतिबंधों के कारण ईरान को SWIFT से हटा दिया गया था।
पहले भुगतान यूरो में एक तुर्की बैंक के माध्यम से होता था, लेकिन वह विकल्प अब उपलब्ध नहीं है। भारत सरकार ने अभी खरीद की आधिकारिक पुष्टि नहीं की है। भारतीय तेल मंत्रालय का निर्णय तकनीकी और व्यावसायिक व्यावहारिकता के आधार पर लिया जाएगा।
होर्मुज जलडमरूमध्य का भू-राजनीतिक संकट
पश्चिम एशिया में युद्ध के कारण होर्मुज जलडमरूमध्य अवरुद्ध हो गया था। इस मार्ग से दुनिया का लगभग 20% तेल और गैस व्यापार होता है।
इस संकट का भारत पर गहरा असर पड़ा है क्योंकि भारत अपनी 88% कच्चे तेल की जरूरत आयात से पूरी करता है। इसके अलावा, 50% प्राकृतिक गैस और 60% LPG भी आयात की जाती है। भारत को आधी से अधिक आपूर्ति मध्य पूर्व से होती है। हाल ही में भारतीय जहाज शिवालिक, नंदा देवी और जग वसंत इस जलडमरूमध्य को पार कर LPG लेकर गुजरात पहुंचे हैं।
निष्कर्ष
पिंग शुन टैंकर का भारत आना भारत-ईरान ऊर्जा संबंधों में नई शुरुआत का संकेत हो सकता है। भारत के लिए यह व्यापार आर्थिक रूप से लाभकारी होने के साथ-साथ आपूर्ति विविधता के लिए भी रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है। हालांकि, व्यापार की निरंतरता 19 अप्रैल के बाद अमेरिकी प्रतिबंध छूट के विस्तार, वैकल्पिक भुगतान तंत्र की स्थापना और भू-राजनीतिक स्थिति पर निर्भर करेगी।
खुशालाल प्रजापति द्वार लिखा गया।
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