प्रकाशित समय : सुबह
लेखक: रबीउल आलम
बांग्लादेश के हालिया आम चुनाव एक ऐतिहासिक मोड़ साबित हुए हैं, लेकिन शायद उस तरह से नहीं जैसा अंतरिम सरकार या विजेता दलों ने सोचा था। हालांकि शेख हसीना की पार्टी अवामी लीग को चुनाव लड़ने से प्रतिबंधित कर दिया गया था और मतपत्रों से उनका प्रसिद्ध चुनाव चिह्न ‘नौका’ (Boat) गायब था, लेकिन चुनावी नतीजों और प्रक्रिया ने अनजाने में ही अवामी लीग के लिए एक नया राजनीतिक स्थान (Political Space) तैयार कर दिया है।
चुनावी वैधता पर सवाल
अवामी लीग के बिना हुए इन चुनावों में तारिक रहमान के नेतृत्व वाली बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) ने भारी बहुमत हासिल किया है। लेकिन इस जीत की चमक कम मतदान प्रतिशत (Voter Turnout) के कारण फीकी पड़ गई है। शेख हसीना ने भारत में अपने निर्वासन से इसे एक ‘सुनियोजित प्रहसन’ करार दिया और दावा किया कि लाखों समर्थकों ने वोट नहीं दिया। जब देश की एक प्रमुख राजनीतिक शक्ति को प्रक्रिया से बाहर रखा जाता है, तो बनने वाली नई सरकार की ‘चुनावी वैधता’ पर हमेशा सवालिया निशान बना रहता है। यही वह राजनीतिक शून्य है जिसे अवामी लीग भविष्य में भुनाने की कोशिश करेगी।

कट्टरपंथ का उदय और अवामी लीग की आवश्यकता
अवामी लीग की अनुपस्थिति में जमात-ए-इस्लामी जैसी कट्टरपंथी ताकतें दूसरे सबसे बड़े राजनीतिक समूह के रूप में उभरी हैं। बांग्लादेश के धर्मनिरपेक्ष और उदारवादी तबके के बीच यह डर घर कर गया है कि कट्टरपंथ के इस उभार को रोकने के लिए जिस ‘सेक्युलर’ राजनीति की जरूरत थी, वह अब मुख्यधारा से गायब है। अवामी लीग के समर्थकों और भारत जैसे पड़ोसियों के लिए यह स्थिति इस दलील को मजबूत करती है कि बांग्लादेश में स्थिरता के लिए अवामी लीग जैसी संतुलित और धर्मनिरपेक्ष ताकत का होना अनिवार्य है।
ऐतिहासिक विरासत और सहानुभूति
अवामी लीग केवल एक पार्टी नहीं, बल्कि 1971 के मुक्ति संग्राम की विरासत है। पार्टी पर लगे प्रतिबंध और उसके नेताओं के खिलाफ कानूनी कार्यवाहियों ने समर्थकों के एक बड़े वर्ग में ‘पीड़ित’ (Victim) होने का भाव पैदा किया है। इतिहास गवाह है कि राजनीतिक प्रतिबंध अक्सर किसी दल को खत्म करने के बजाय उसके प्रति सहानुभूति पैदा करते हैं। ‘बिना नौका, कोई वोट नहीं’ के नारे के साथ हुए बहिष्कार ने यह साबित किया कि पार्टी का आधार अभी भी जमीन पर मौजूद है।
नई सरकार की चुनौतियाँ
तारिक रहमान के सामने अब एक खंडित जनादेश और अस्थिर अर्थव्यवस्था की चुनौती है। यदि नई सरकार सुशासन देने में विफल रहती है, तो जनता के मन में अवामी लीग के कार्यकाल के दौरान हुए ‘विकास और बुनियादी ढांचे’ के कार्यों के प्रति पुरानी यादें (Nostalgia) ताजा हो सकती हैं। शासन की विफलता हमेशा विपक्ष के लिए रास्ता खोलती है, चाहे वह प्रतिबंधित ही क्यों न हो।
निष्कर्ष
बांग्लादेश की राजनीति अब एक नए और अनिश्चित दौर में प्रवेश कर चुकी है। भले ही अवामी लीग आज संसद से बाहर है, लेकिन उसकी अनुपस्थिति ने ही उसे चर्चा के केंद्र में ला खड़ा किया है। लोकतंत्र में किसी भी बड़े राजनीतिक दल को लंबे समय तक हाशिए पर रखना मुश्किल होता है। इन चुनावों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि बांग्लादेश में स्थायी शांति और स्थिरता तब तक संभव नहीं है जब तक कि सभी राजनीतिक शक्तियों को एक समावेशी लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा नहीं बनाया जाता।
खुशालाल प्रजापति द्वार लिखा गया।
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