प्रकाशित समय : सुबह
भारत में मानसून को देश की ‘लाइफलाइन’ माना जाता है, लेकिन हाल के वर्षों में इसकी चाल और दिशा में चौंकाने वाले बदलाव देखे गए हैं। एक नए शोध में खुलासा हुआ है कि भारत से करीब 6800 किलोमीटर दूर आर्कटिक महासागर में पिघलती बर्फ भारतीय मानसून को पश्चिम की ओर धकेल रही है।
IITM के शोध में हुआ बड़ा खुलासा
इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ ट्रॉपिकल मेटियोरोलॉजी (IITM) के शोधकर्ताओं ने 1979 से 2022 तक के जलवायु आंकड़ों का विश्लेषण किया। इस अध्ययन का उद्देश्य यह समझना था कि क्या उत्तरी ध्रुव (Arctic) पर समुद्री बर्फ के स्तर का भारतीय ग्रीष्मकालीन मानसून (ISMR) से कोई सीधा संबंध है।

मानसून का पश्चिम की ओर झुकाव
अध्ययन में पाया गया कि हालांकि भारत में मानसून की कुल बारिश में वृद्धि हुई है, लेकिन सीजन के अंत (अगस्त-सितंबर) में होने वाली भारी बारिश अब देश के पश्चिमी हिस्सों की ओर अधिक केंद्रित हो रही है। शोधकर्ताओं के अनुसार, यह बदलाव पर्यावरण और खेती के लिए गंभीर संकेत है।
आर्कटिक की बर्फ और मानसून का कनेक्शन
IITM के वैज्ञानिक और इस शोध के लेखक सुबोध कुमार साहा के अनुसार:
- जून-जुलाई का प्रभाव: जून और जुलाई के दौरान आर्कटिक की समुद्री बर्फ में आने वाला बदलाव मानसून के अंतिम चरण (अगस्त-सितंबर) को सबसे ज्यादा प्रभावित करता है।
- कम बर्फ, ज्यादा बारिश: जिन वर्षों में आर्कटिक में बर्फ का स्तर कम रहा, उन वर्षों में भारत में मानसूनी बारिश अधिक दर्ज की गई।
- एटमोस्फेरिक पाथवे: जब आर्कटिक गर्म होता है और बर्फ पिघलती है, तो वायुमंडल में गर्मी के संचरण का तरीका बदल जाता है। यह बदलाव हजारों किलोमीटर दूर भारतीय उपमहाद्वीप तक पहुँचता है।
भारत के लिए क्यों है यह चिंता का विषय?
मानसून की दिशा में यह बदलाव केवल मौसम का बदलाव नहीं है, बल्कि इसके व्यापक आर्थिक और सामाजिक प्रभाव हैं:
- खेती पर असर: अगस्त और सितंबर की बारिश यह तय करती है कि फसलें लहलहाएंगी या बाढ़ की भेंट चढ़ जाएंगी।
- पानी का संकट: अगर बारिश एक क्षेत्र (पश्चिम) में केंद्रित हो जाती है और दूसरे क्षेत्रों में कम होती है, तो इससे देश भर में जल प्रबंधन और पानी की उपलब्धता का संतुलन बिगड़ सकता है।
- अनिश्चितता: बारिश के पैटर्न में बदलाव से किसानों के लिए बुवाई और कटाई का समय तय करना मुश्किल हो रहा है।
वैज्ञानिक निष्कर्ष
IITM के वैज्ञानिक हेमंतकुमार एस. चौधरी ने बताया कि ग्लोबल वार्मिंग के कारण तापमान का असमान वितरण हो रहा है। आर्कटिक की गर्मी वायुमंडलीय लहरों के माध्यम से पूरे महाद्वीप में फैलती है, जिससे मानसून का रास्ता बदल रहा है। यह शोध प्रसिद्ध जर्नल ‘ओशन-लैंड-एटमॉस्फियर रिसर्च’ में प्रकाशित हुआ है।
खुशालाल प्रजापति द्वार लिखा गया।
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