ईस्ट इंडिया कंपनी फिर हुई बंद: संजीव मेहता का लक्जरी लाइफस्टाइल ब्रांड दिवालिया, 1857 के बाद दूसरी बार हुआ अंत

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प्रकाशित समय : सुबह

लंदन: कभी दुनिया के एक बड़े हिस्से पर राज करने वाली और भारत में ब्रिटिश उपनिवेशवाद की नींव रखने वाली ‘ईस्ट इंडिया कंपनी’ (EIC) एक बार फिर बंद हो गई है। लंदन स्थित इसका आधुनिक अवतार, जिसे एक भारतीय व्यवसायी संजीव मेहता ने लक्जरी रिटेल ब्रांड के रूप में पुनर्जीवित किया था, अब दिवालिया हो गया है।

Exterior view of the East India Company luxury retail store in London Mayfair with a closure notice, representing the liquidation of Sanjiv Mehta's brand.
इतिहास का एक और अध्याय समाप्त! 🚩 जिस ‘ईस्ट इंडिया कंपनी’ ने कभी भारत पर राज किया था, उसका आधुनिक अवतार एक बार फिर बंद हो गया है। भारतीय उद्यमी संजीव मेहता का लक्जरी ब्रांड अब दिवालिया हो चुका है। लंदन के मेफेयर स्टोर पर ताला लग गया है। जानिए आखिर क्या रही इस बड़े पतन की वजह?

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मुख्य बातें:

  • दिवालियापन: कंपनी को लिक्विडेशन (परिसमापन) में डाल दिया गया है। रिपोर्ट्स के अनुसार, कंपनी पर अपनी मूल कंपनी (पेरेंट कंपनी) का 6 लाख पाउंड (लगभग 6.3 करोड़ रुपये), टैक्स के रूप में 1.93 लाख पाउंड और कर्मचारियों के वेतन का 1.63 लाख पाउंड बकाया है।
  • स्टोर और वेबसाइट बंद: लंदन के पॉश इलाके मेफेयर (97 न्यू बॉन्ड स्ट्रीट) में स्थित इसका भव्य स्टोर अब खाली हो चुका है और कंपनी की आधिकारिक वेबसाइट भी काम नहीं कर रही है।
  • संजीव मेहता का सपना: मुंबई में जन्मे ब्रिटिश-भारतीय उद्यमी संजीव मेहता ने 2010 में इस ऐतिहासिक नाम के अधिकार खरीदे थे। उन्होंने इसे चाय, चॉकलेट, मसाले और अन्य प्रीमियम सामान बेचने वाले एक लक्जरी ब्रांड के रूप में पेश किया था।

एक भारतीय का ‘प्रतिशोध’ और ‘मुक्ति’ जब संजीव मेहता ने ईस्ट इंडिया कंपनी को खरीदा था, तो इसे विश्व स्तर पर एक प्रतीकात्मक जीत के रूप में देखा गया था। मेहता ने उस समय कहा था, “एक भारतीय के रूप में, यह मेरे लिए मुक्ति (redemption) की भावना है—उस कंपनी का मालिक होना जिसने कभी हम पर राज किया था।” उन्होंने इस ब्रांड को औपनिवेशिक शोषण के प्रतीक से बदलकर ‘करुणा’ और ‘लक्जरी’ के ब्रांड के रूप में स्थापित करने की कोशिश की थी।

इतिहास और पतन मूल ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना 1600 में हुई थी। 1857 के भारतीय विद्रोह (सिपाही विद्रोह) के बाद, ब्रिटिश क्राउन ने कंपनी से भारत का नियंत्रण छीन लिया था और 1874 में इसे पूरी तरह भंग कर दिया गया था।

करीब 135 साल बाद संजीव मेहता ने इसे दोबारा शुरू किया, जिसमें आनंद महिंद्रा जैसे दिग्गजों ने भी निवेश किया था। हालांकि, आधुनिक दौर की आर्थिक चुनौतियों और लक्जरी रिटेल सेक्टर में आई गिरावट के कारण यह दूसरी पारी भी समाप्त हो गई है।

आगे क्या? ब्रिटिश मीडिया के अनुसार, कंपनी के खिलाफ कानूनी कार्यवाही शुरू हो चुकी है। मेफेयर स्थित स्टोर के बाहर अब ‘किराए के लिए उपलब्ध’ के बोर्ड लग गए हैं, जो इतिहास की सबसे विवादास्पद और शक्तिशाली कंपनियों में से एक के इस नए अध्याय के अंत का संकेत है।

खुशालाल प्रजापति द्वार लिखा गया।

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