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नई दिल्ली: भारत ने लगभग सात साल के बाद ईरान से कच्चा तेल (क्रूड ऑयल) खरीदना फिर से शुरू कर दिया है। यह खबर तब आई है जब मध्य-पूर्व में अमेरिका और इजराइल बनाम ईरान के बीच चल रहे युद्ध ने दुनिया भर में तेल आपूर्ति को बुरी तरह प्रभावित किया है।
भारत के पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने शनिवार, 4 अप्रैल 2026 को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘X’ पर एक बयान जारी कर यह जानकारी दी।

क्या हुआ?
भारतीय तेल कंपनियों (रिफाइनरीज) ने मध्य-पूर्व की आपूर्ति में रुकावट के बीच ईरान से कच्चा तेल खरीदा है। इसके साथ ही, ईरान का एलपीजी (रसोई गैस) लेकर आया एक जहाज — ‘सी बर्ड’ — लगभग 44,000 मीट्रिक टन गैस के साथ 2 अप्रैल को मंगलुरु बंदरगाह पर पहुंच गया और उसकी अनलोडिंग शुरू हो गई।
पेट्रोलियम मंत्रालय ने कहा:
“मध्य-पूर्व में आपूर्ति बाधित होने के बावजूद भारतीय रिफाइनरीज ने अपनी जरूरत का कच्चा तेल हासिल कर लिया है, जिसमें ईरान से आया तेल भी शामिल है। ईरानी तेल के भुगतान में कोई रुकावट नहीं है।”
सात साल क्यों रुका था तेल आयात?
भारत ने मई 2019 में ईरान से तेल खरीदना बंद कर दिया था। इसकी वजह थी अमेरिका का दबाव — अमेरिका ने ईरान पर कड़े प्रतिबंध (सैंक्शन) लगाए थे और भारत समेत कई देशों को ईरान से तेल न खरीदने को कहा था।
अपने सबसे ऊंचे स्तर पर, ईरानी तेल भारत के कुल तेल आयात का करीब 11.5 प्रतिशत हुआ करता था। साल 2018 में भारत हर दिन लगभग 5,18,000 बैरल ईरानी तेल आयात करता था।
अब क्या बदला?
मध्य-पूर्व में फरवरी 2026 के अंत से अमेरिका-इजराइल और ईरान के बीच युद्ध छिड़ गया। इस युद्ध के चलते ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद कर दिया। यह रास्ता दुनिया के कुल तेल व्यापार का करीब 20 प्रतिशत हिस्सा संभालता है।
इस रुकावट से दुनिया भर में तेल की कमी हो गई और कीमतें तेजी से बढ़ीं। मार्च 2026 की शुरुआत में ब्रेंट क्रूड की कीमत 13 प्रतिशत तक बढ़कर करीब 82 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई।
इस संकट से निपटने के लिए अमेरिका ने पिछले महीने (मार्च 2026) में ईरानी तेल और तेल उत्पादों पर लगे प्रतिबंध को अस्थायी रूप से हटा लिया।
भारत की स्थिति क्या है?
भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक और उपभोक्ता देश है। देश अपनी कुल तेल जरूरत का 80 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा विदेश से मंगाता है। इसलिए मध्य-पूर्व में अशांति का सीधा असर भारत पर पड़ता है।
मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि:
- भारत 40 से ज्यादा देशों से कच्चा तेल आयात करता है।
- तेल कंपनियां अपनी व्यापारिक जरूरत के हिसाब से किसी भी देश से तेल खरीदने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र हैं।
- आने वाले महीनों के लिए भारत की तेल जरूरतें पूरी तरह सुरक्षित हैं।
एक जहाज के रास्ता बदलने पर सफाई
कुछ रिपोर्टों में कहा गया था कि एक ईरानी तेल टैंकर — ‘पिंग शुन’ — जो पहले भारत के वडीनार बंदरगाह की तरफ जा रहा था, उसने अपना रुख बदलकर चीन का रुख कर लिया। इस पर मंत्रालय ने कहा कि यह खबर ‘तथ्यात्मक रूप से गलत’ है। तेल व्यापार में जहाजों का गंतव्य बदलना एक सामान्य व्यापारिक और परिचालन प्रक्रिया है।
अंतरराष्ट्रीय संदर्भ
अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) ने इस संकट को “वैश्विक तेल बाजार के इतिहास में सबसे बड़ी आपूर्ति बाधा” बताया है।
एशिया के देश — खासकर भारत, चीन, जापान और दक्षिण कोरिया — इस संकट से सबसे ज्यादा प्रभावित हुए हैं, क्योंकि ये देश होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले तेल पर बहुत ज्यादा निर्भर हैं। फिलीपींस ने तो राष्ट्रीय ऊर्जा आपातकाल तक घोषित कर दिया।
ईरानी तेल क्यों फायदेमंद है?
ईरानी तेल अक्सर पश्चिमी प्रतिबंधों के कारण सस्ती कीमतों पर मिलता है। इससे भारत जैसे मूल्य के प्रति संवेदनशील देश को राहत मिलती है। साथ ही, भारतीय रिफाइनरियां ईरानी क्रूड के साथ काम करने में पहले से अनुभवी हैं।
निष्कर्ष
मध्य-पूर्व के बदलते हालात और वैश्विक तेल आपूर्ति में भारी बाधा के बीच भारत ने ऊर्जा सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए एक व्यावहारिक कदम उठाया है। सात साल बाद ईरान से तेल खरीदना यह दिखाता है कि भारत अपनी जरूरतों के लिए विभिन्न स्रोतों से तेल हासिल करने में सक्षम है और किसी एक देश या क्षेत्र पर निर्भर नहीं रहना चाहता।
खुशालाल प्रजापति द्वार लिखा गया।
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