पूरी कहानी क्या है?
पिछले कुछ हफ़्तों से, होर्मुज़ जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) दुनिया की सबसे बड़ी चिंता बनकर उभरा था। यह एक संकरा समुद्री रास्ता है जिससे होकर दुनिया का लगभग 20 प्रतिशत तेल और गैस गुज़रता है। 28 फरवरी, 2026 को, संयुक्त राज्य अमेरिका और इज़राइल ने ईरान पर हमले किए। जवाबी कार्रवाई में, ईरान ने इस अहम रास्ते को बंद कर दिया। तेल के टैंकर फँसे रह गए, तेल की कीमतें आसमान छूने लगीं, और वैश्विक अर्थव्यवस्था की नींव हिल गई।
युद्धविराम और नई उम्मीद
7-8 अप्रैल, 2026 को, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प और ईरान के बीच दो हफ़्ते के युद्धविराम पर सहमति बनी। इस समझौते को पाकिस्तान की मदद से संभव बनाया गया। ट्रम्प ने साफ तौर पर कहा कि यह युद्धविराम तभी कायम रहेगा जब ईरान होर्मुज़ जलडमरूमध्य को पूरी तरह और तुरंत फिर से खोल दे। ईरान ने जवाब में कहा कि वह जहाज़ों के लिए सुरक्षित रास्ता देगा, लेकिन इसके लिए उसकी सेना से पहले मंज़ूरी लेनी होगी। दूसरे शब्दों में, यह रास्ता खुलना शुरू हो गया है, हालाँकि अभी यह पूरी तरह से साफ नहीं है।

प्लान B: फ्रांस के नेतृत्व में 15 देशों की पहल
इस बीच, 8 अप्रैल को, फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने एक बड़ी घोषणा की। उन्होंने बताया कि लगभग 15 देशों का एक गठबंधन इस समय होर्मुज़ जलडमरूमध्य से समुद्री यातायात फिर से शुरू करने की योजना बना रहा है। इस पहल को एक रक्षात्मक मिशन के तौर पर देखा जा रहा है—यानी इसका मकसद लड़ाई करना नहीं, बल्कि जहाज़ों के लिए सुरक्षित रास्ता सुनिश्चित करना है। इस प्रयास का एक अहम पहलू यह है कि इसे ईरान के विरोध में नहीं, बल्कि उसके सहयोग से पूरा किया जाएगा।
मैक्रों ने कहा: “लगभग 15 देश अभी तैयार हैं और फ्रांस के नेतृत्व में इस रक्षात्मक मिशन की योजना बना रहे हैं, जिसका मकसद ईरान के साथ तालमेल बिठाकर समुद्री यातायात फिर से शुरू करना है।” उन्होंने यह बयान अपने रक्षा मंत्रियों के साथ एक बैठक की शुरुआत में दिया।
40 से ज़्यादा देश इस प्रयास में शामिल हुए
इससे पहले, 2 अप्रैल को, ब्रिटेन की विदेश सचिव यवेट कूपर ने एक बड़ी ऑनलाइन बैठक बुलाई जिसमें 40 से ज़्यादा देशों के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। इस बैठक में शामिल होने वालों में यूरोपीय संघ, इटली, नीदरलैंड और UAE शामिल थे। सभी ने मिलकर यह फैसला किया कि होर्मुज़ जलडमरूमध्य को फिर से खोलने के लिए सभी कूटनीतिक और आर्थिक उपायों का इस्तेमाल किया जाएगा। इटली, नीदरलैंड और UAE ने भी संयुक्त रूप से उर्वरक और ज़रूरी सामान ले जाने वाले जहाज़ों के गुज़रने को आसान बनाने के लिए एक विशेष कॉरिडोर की मांग की, ताकि वैश्विक खाद्य संकट को टाला जा सके।
लेकिन रास्ता अभी भी मुश्किल है
सीज़फ़ायर के बाद भी, होर्मुज़ जलडमरूमध्य पूरी तरह से नहीं खुला है। 8 अप्रैल तक, केवल 11 जहाज़ ही वहाँ से गुज़र पाए थे—यह उस स्थिति से बिल्कुल अलग है जब रुकावट से पहले रोज़ाना 100 से 120 जहाज़ इस रास्ते से गुज़रते थे। दुनिया की सबसे बड़ी शिपिंग कंपनी, मर्सक ने माना कि हालाँकि सीज़फ़ायर से निश्चित रूप से एक अवसर मिला है, लेकिन अभी पूरी सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं है। बीमा कंपनियाँ जहाज़ों का बीमा करने में अभी भी हिचकिचा रही हैं, क्योंकि इस क्षेत्र में खतरा अभी भी बना हुआ है। इस समय खाड़ी क्षेत्र में 800 से ज़्यादा जहाज़ फँसे हुए हैं, जिन पर 20,000 से ज़्यादा नाविक सवार हैं, जो एक महीने से ज़्यादा समय से अपने जहाज़ों में ही फँसे हुए हैं।
लेबनान भी शामिल होना चाहता है
राष्ट्रपति मैक्रों ने कहा कि हालाँकि सीज़फ़ायर एक सकारात्मक कदम है, लेकिन लेबनान में स्थिति अभी भी बहुत गंभीर है। इज़रायल ने लेबनान पर बड़े हमले किए हैं, जिसके परिणामस्वरूप 182 से ज़्यादा लोगों की मौत हो गई है। लेबनान के साथ फ्रांस के लंबे समय से चले आ रहे ऐतिहासिक संबंधों को देखते हुए, मैक्रों ने माँग की है कि लेबनान को भी सीज़फ़ायर समझौते में शामिल किया जाए।
भारत पर इसका क्या असर होगा?
यह खबर भारत के लिए बहुत ज़्यादा मायने रखती है। भारत अपनी तेल की ज़रूरतों का एक बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों से आयात करता है, और यह आपूर्ति होर्मुज़ जलडमरूमध्य के रास्ते ही आती है। जब यह ज़रूरी रास्ता बंद हो गया था, तो तेल की कीमतें बहुत बढ़ गई थीं, जिससे आम नागरिक पर आर्थिक बोझ पड़ गया था। अब जब 15 देशों ने मिलकर इस रास्ते को फिर से खोलने की कोशिशें शुरू कर दी हैं, तो भारत के लिए भी राहत की उम्मीदें बढ़ गई हैं।
आगे क्या होगा?
अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत 10 अप्रैल को पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में होनी तय है। उम्मीद है कि अमेरिका के उपराष्ट्रपति जे.डी. वेंस, स्टीव विटकॉफ़ और जेरेड कुशनर इस बातचीत में शामिल होंगे। दोनों पक्ष मानते हैं कि आने वाले दो हफ़्ते बहुत अहम होंगे। अगर इस दौरान होर्मुज़ जलडमरूमध्य पूरी तरह से खुल जाता है और बातचीत सफल रहती है, तो दुनिया एक बड़े संकट से बच सकती है।
संयुक्त राष्ट्र की समुद्री एजेंसी, IMO (अंतर्राष्ट्रीय समुद्री संगठन), भी इन कोशिशों में सक्रिय रूप से शामिल है। उन्होंने कहा है कि जहाज़ों के लिए एक सुरक्षित मार्ग बनाने का काम चल रहा है, और मुख्य प्रयास खाड़ी में इस समय फँसे 20,000 नाविकों को वहाँ से निकालने का होगा।
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