प्रकाशित समय : सुबह
हाल के दशकों में वैज्ञानिकों ने जलवायु के दो स्पष्ट रुझानों पर ध्यान दिया है: पहला, भारत में मानसून की कुल बारिश में वृद्धि हुई है, और दूसरा, मौसम के अंत में होने वाली सबसे भारी बारिश धीरे-धीरे देश के पश्चिमी हिस्सों की ओर खिसक रही है। अब, एक नए शोध से पता चला है कि हजारों मील दूर आर्कटिक महासागर में पिघलती समुद्री बर्फ इस बदलाव के पीछे एक मुख्य कारण हो सकती है।
आर्कटिक की गर्मी और मानसून का नया रास्ता पुणे स्थित ‘इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ ट्रॉपिकल मेटियोरोलॉजी’ (IITM) के शोधकर्ताओं की एक रिपोर्ट के अनुसार, शुरुआती गर्मियों (विशेषकर जून और जुलाई) में आर्कटिक की समुद्री बर्फ का कम होना, अगस्त और सितंबर में होने वाली मानसूनी बारिश की तीव्रता और स्थान दोनों को गहराई से प्रभावित करता है।

IITM के वैज्ञानिक और इस अध्ययन के मुख्य लेखक हेमंतकुमार एस. चौधरी ने बताया, “ग्लोबल वार्मिंग के कारण दुनिया भर में तापमान का वितरण असमान हो रहा है, जिससे आर्कटिक की बर्फ तेजी से पिघल रही है। ध्रुवीय बर्फ का यह पिघलना वैश्विक जलवायु प्रणाली पर दूरगामी प्रभाव डालता है, क्योंकि यह ऊर्जा के संतुलन और भूमध्य रेखा से ध्रुवों तक ऊर्जा के परिवहन के तरीके को बदल देता है।”
अध्ययन के मुख्य निष्कर्ष शोधकर्ताओं ने 1979 से 2022 तक के आंकड़ों का विश्लेषण किया और पाया कि जिस वर्ष आर्कटिक में समुद्री बर्फ कम होती है, उस वर्ष भारत में मानसूनी बारिश अधिक तीव्र होती है।
- समय का महत्व: जून और जुलाई की आर्कटिक परिस्थितियों का सबसे बड़ा असर अगस्त और सितंबर की बारिश पर पड़ता है।
- पश्चिमी शिफ्ट: आंकड़ों से स्पष्ट हुआ कि आर्कटिक बर्फ में गिरावट का सीधा संबंध पश्चिम और उत्तर-पश्चिम भारत (जैसे राजस्थान, गुजरात और पंजाब के कुछ हिस्से) में बढ़ती बारिश से है।
- वायुमंडलीय मार्ग: वैज्ञानिकों ने पाया कि यह प्रभाव ‘ऊपरी वायुमंडलीय वायुगतिकीय मार्गों’ (upper-level dynamical pathways) के माध्यम से होता है, जो ध्रुवीय क्षेत्रों को दक्षिण एशियाई मानसून प्रणाली से जोड़ते हैं।
खेती और जल प्रबंधन पर प्रभाव मानसून के पैटर्न में यह बदलाव केवल एक वैज्ञानिक खोज नहीं है, बल्कि भारत के लिए एक बड़ी चुनौती भी है। अगस्त और सितंबर की बारिश यह तय करती है कि फसलें लहलहाएंगी या बाढ़ की भेंट चढ़ जाएंगी।
IITM के वैज्ञानिक समीर पोखरेल ने कहा, “जैसे-जैसे आर्कटिक की बर्फ पिघलना जारी रहेगी, यह मानसून को और अधिक शक्तिशाली बना सकती है और उसे पश्चिम की ओर विस्तार देने में मदद कर सकती है।” इससे बाढ़ की आशंका, जलाशयों के प्रबंधन और फसल चक्र की योजना बनाने के तरीकों को पूरी तरह से बदलना पड़ सकता है।
खुशालाल प्रजापति द्वार लिखा गया।
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