प्रकाशित समय : सुबह
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) अपनी तकनीकी विशेषज्ञता के साथ-साथ अपनी पारदर्शिता के लिए भी दुनिया भर में सम्मानित है। जनवरी 2025 में जब भारत का 100वां अंतरिक्ष मिशन (श्रीहरिकोटा से) NVS-02 अपने निर्धारित स्लॉट तक नहीं पहुँच पाया था, तब से वैज्ञानिक जगत में इस पर मंथन जारी था। अब, एक साल से अधिक समय के बाद, इसरो ने इस विफलता की विस्तृत ‘पोस्टमार्टम रिपोर्ट’ जारी की है।
क्या था वो ‘विलेन’ जिसने मिशन को रोका?
इसरो की एपेक्स कमेटी की रिपोर्ट के अनुसार, समस्या न तो रॉकेट के इंजन में थी और न ही ईंधन में। विफलता की असली वजह ‘पाइरो वाल्व’ (Pyro Valve) सिस्टम में आई एक तकनीकी खराबी थी।
सरल भाषा में समझें तो, पाइरो वाल्व एक छोटे विस्फोटक उपकरण की तरह होता है जो उपग्रह के इंजन तक ईंधन (Oxidiser) पहुँचाने वाले रास्ते को खोलता है। रिपोर्ट के मुताबिक, इस वाल्व को सक्रिय करने वाला इलेक्ट्रिक सिग्नल उस तक पहुँच ही नहीं पाया।

वजह: कनेक्टर के भीतर मौजूद ‘इलेक्ट्रिकल कॉन्टैक्ट्स’ का अपनी जगह से हट जाना या ढीला हो जाना (Disengagement of contacts)। ताज्जुब की बात यह है कि मुख्य (Main) और बैकअप (Redundant), दोनों ही रास्तों में यह समस्या एक साथ आई, जिससे इंजन फायर नहीं हो सका और सैटेलाइट अपनी अंडाकार कक्षा (GTO) से निकलकर गोलाकार ऑपरेशनल कक्षा में नहीं जा पाया।
विशेषज्ञ की राय: अंतरिक्ष में छोटी सी चूक और बड़ा सबक
एक अंतरिक्ष प्रेमी और विश्लेषक के तौर पर, मैं इसे इसरो की कार्यप्रणाली का एक अनिवार्य हिस्सा मानता हूँ। अंतरिक्ष विज्ञान में 99% सफलता मायने नहीं रखती; यहाँ 0.1% की त्रुटि भी पूरे मिशन को ‘स्ट्रेंडेड’ (अटका हुआ) कर सकती है।
NVS-02 मिशन तकनीकी रूप से पूरी तरह ‘फेल’ नहीं था क्योंकि सैटेलाइट के अन्य सभी उपकरण और संचार प्रणालियाँ सामान्य रूप से काम कर रही थीं। लेकिन एक ‘लूज कनेक्शन’ ने इसे उस जगह पहुँचने से रोक दिया जहाँ से यह भारत के ‘NavIC’ (नाविक) सिस्टम को मजबूती दे सकता था।
अच्छी खबर: सुधार का असर दिख चुका है
इसरो ने केवल कारण नहीं ढूँढा, बल्कि उसे तुरंत ठीक भी किया। रिपोर्ट में पुष्टि की गई है कि:
- CMS-03 मिशन: नवंबर 2025 में LVM-3 M5 रॉकेट के जरिए लॉन्च किए गए CMS-03 उपग्रह में इन सुधारों को लागू किया गया।
- सफलता: इस बार पाइरो सिस्टम ने बेहतरीन काम किया और उपग्रह अपनी सही कक्षा में स्थापित हुआ।
- भविष्य की तैयारी: आने वाले सभी मिशनों में अब इन कनेक्टर्स की विश्वसनीयता को दोगुना करने के लिए नए ‘रिडंडेंसी’ मानक अपनाए जाएंगे।
निष्कर्ष: विफलता ही सफलता की सीढ़ी है
इसरो का यह खुलासा यह साबित करता है कि भारतीय वैज्ञानिक अपनी गलतियों को छिपाते नहीं, बल्कि उनसे सीखते हैं। NVS-02 की घटना ने हमें सिखाया कि भविष्य के ‘गगनयान’ जैसे मानव मिशनों के लिए सुरक्षा और कनेक्टर्स की जांच के मानक कितने ऊंचे होने चाहिए। भारत का ‘नाविक’ नेटवर्क इस झटके के बावजूद मजबूत है और जल्द ही नए उपग्रहों के साथ यह पूर्ण क्षमता हासिल कर लेगा।
खुशालाल प्रजापति द्वार लिखा गया।
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