चौंकाने वाला यू-टर्न: केरल का विशाल नागरिक सर्वेक्षण रुका! आप विश्वास नहीं करेंगे कि हाई कोर्ट ने क्यों दखल दिया!

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प्रकाशित समय : सुबह

बड़ा उलटफेर जिसने राज्य को हिला दिया

केरल में इस समय एक जबरदस्त राजनीतिक तूफान उठा हुआ है। एक चौंकाने वाले घटनाक्रम में, केरल हाई कोर्ट ने राज्य सरकार के महत्वाकांक्षी “नव केरल सिटीजन रिस्पॉन्स प्रोग्राम” (Nava Kerala Citizen Response Programme) पर आधिकारिक रूप से रोक लगा दी है। यह प्रोजेक्ट कोई छोटा-मोटा काम नहीं था, बल्कि एक विशाल डोर-टू-डोर सर्वे था। इसका लक्ष्य राज्य के लगभग 80 लाख घरों तक पहुंचना था। लेकिन, जैसे ही यह प्रोजेक्ट अपनी पूरी रफ़्तार पकड़ रहा था, अदालत ने इस पर ‘इमरजेंसी ब्रेक’ लगा दिया। अदालत के इस फैसले ने सत्ताधारी सरकार को बहुत ही मुश्किल स्थिति में डाल दिया है। अब हर कोई एक ही सवाल पूछ रहा है: आखिर कोर्ट ने इतने बड़े प्रोजेक्ट को बीच में क्यों रोका?

“नव केरल” सर्वे का मुख्य उद्देश्य जनता की राय लेना बताया गया था। सरकार यह जानना चाहती थी कि लोग उनकी कल्याणकारी योजनाओं के बारे में क्या सोचते हैं। साथ ही, वे भविष्य के विकास के लिए लोगों से सुझाव भी मांग रहे थे। ऊपर से देखने पर यह एक सीधा-साधा जनसंपर्क अभियान लग रहा था। लेकिन, हाई कोर्ट ने इसे एक अलग नजरिए से देखा। 17 फरवरी 2026 को आए अदालत के इस हस्तक्षेप ने पूरी कहानी ही बदल दी है। अब इसे वाम लोकतांत्रिक मोर्चा (LDF) सरकार के लिए एक बड़ा झटका माना जा रहा है।

A red "Halted" stamp over Kerala government survey documents with the High Court building in the background.
जिस पल केरल हाई कोर्ट ने नव केरल सिटीजन रिस्पॉन्स प्रोग्राम पर स्टे ऑर्डर जारी किया।

क्या था यह ‘नव केरल’ सर्वेक्षण?

कोर्ट के फैसले को समझने के लिए, हमें पहले इस सर्वे की बारीकियों को समझना होगा। केरल सरकार ने 2026 की शुरुआत में “नव केरल सिटीजन रिस्पॉन्स प्रोग्राम” लॉन्च किया था। यह योजना वास्तव में बहुत बड़ी थी। हजारों स्वयंसेवकों (volunteers) को राज्य के कोने-कोने में भेजा गया था। उनका काम घर-घर जाकर परिवारों से बात करना था। वे विकास, सामाजिक कल्याण और स्थानीय जरूरतों के बारे में सवाल पूछ रहे थे।

सरकार ने इस प्रोजेक्ट के लिए 20 करोड़ रुपये का भारी-भरकम बजट आवंटित किया था। इस प्रोजेक्ट की जिम्मेदारी सूचना और जनसंपर्क विभाग (IPRD) को सौंपी गई थी। सरकार का लक्ष्य फरवरी के अंत तक इस सर्वे को पूरा करना था। चूंकि 2026 के विधानसभा चुनाव करीब आ रहे हैं, इसलिए सरकार का दावा था कि यह शासन सुधारने का एक तरीका है। उन्होंने कहा कि वे “जनता की आवाज” सुनना चाहते हैं। लेकिन विपक्ष और कई सामाजिक कार्यकर्ताओं को इसमें कुछ गड़बड़ी नजर आई।


कोर्ट की चेतावनी: बजट में बड़ी गड़बड़ी

अदालत के हस्तक्षेप का सबसे बड़ा कारण वित्तीय अनुशासन (financial discipline) की कमी थी। मुख्य न्यायाधीश सौमेन सेन और न्यायमूर्ति वी.एम. श्याम कुमार की खंडपीठ ने कुछ बहुत ही तीखी टिप्पणियां कीं। उन्होंने पाया कि सरकार ने महत्वपूर्ण नियमों को ताक पर रख दिया था। सरल शब्दों में कहें तो, सर्वे के लिए इस्तेमाल किया गया पैसा सही तरीके से मंजूर नहीं किया गया था।

कोर्ट ने गौर किया कि 20 करोड़ रुपये का फंड “विशेष पीआर अभियान” (Special PR Campaigns) नाम के एक हेड से लिया गया था। हालांकि, राज्य के बजट में उस विशिष्ट श्रेणी के लिए केवल 4.6 करोड़ रुपये ही रखे गए थे। अदालत ने एक सीधा सवाल पूछा: जब बजट में केवल 4 करोड़ रुपये ही दिख रहे हैं, तो आप 20 करोड़ रुपये कैसे खर्च कर सकते हैं? यह विसंगति “बिजनेस रूल्स” का सीधा उल्लंघन थी। न्यायाधीशों ने स्पष्ट कहा कि सरकार विधायिका की अनुमति के बिना जनता का पैसा खर्च नहीं कर सकती। उन्होंने इस कदम को “मनमाना” और “अनुचित” करार दिया।


राजनीतिक मोड़: ‘अंदरूनी जानकारी’ के आरोप

पैसे के विवाद के अलावा, इसमें एक गहरा राजनीतिक विवाद भी शामिल था। कोर्ट ने इस बात की भी जांच की कि सर्वे का आयोजन कैसे किया गया था। यह बात सामने आई कि सीपीआई (एम) के राज्य सचिव, एम.वी. गोविंदन ने सितंबर 2025 में ही अपने पार्टी कार्यकर्ताओं को एक सर्कुलर भेजा था। इस सर्कुलर में पार्टी सदस्यों से सर्वे के लिए स्वयंसेवक के रूप में पंजीकरण करने को कहा गया था।

यहां चौंकाने वाली बात यह है कि यह सर्कुलर सरकार द्वारा आधिकारिक तौर पर सर्वे की घोषणा करने से पहले ही भेज दिया गया था। इससे अदालत को विश्वास हो गया कि सत्ताधारी दल को “अंदरूनी जानकारी” पहले से थी। ऐसा लगा जैसे सर्वे खास तौर पर पार्टी के चुनाव अभियान में मदद करने के लिए डिजाइन किया गया था। अदालत ने टिप्पणी की कि ऐसा प्रतीत होता है कि पार्टी ही सरकार का चेहरा बन गई है। इसने गंभीर सवाल खड़े किए कि क्या सार्वजनिक धन का उपयोग किसी राजनीतिक दल के लाभ के लिए किया जा रहा है।

स्वयंसेवकों का रहस्य: आपदा राहत या चुनावी काम?

विवाद का एक और बड़ा बिंदु “सोशल वॉलंटियर फोर्स” (Social Volunteer Force) का इस्तेमाल था। यह फोर्स 2020 में प्राकृतिक आपदाओं और महामारी के दौरान बनाई गई थी। इसका मूल उद्देश्य बाढ़ या स्वास्थ्य आपातकाल जैसी आपदाओं के दौरान लोगों की मदद करना था। हालांकि, सरकार ने इसी पोर्टल का उपयोग “नव केरल” सर्वे के लिए स्वयंसेवकों की भर्ती के लिए किया।

हाई कोर्ट इस बात से बिल्कुल खुश नहीं था। उन्होंने नोट किया कि राज्य अभी किसी आपदा का सामना नहीं कर रहा है। फीडबैक सर्वे के लिए आपदा राहत पोर्टल का उपयोग करना संसाधनों का दुरुपयोग लगा। इसके अलावा, इसमें पारदर्शिता की भारी कमी थी। सरकार ने इस बारे में पर्याप्त प्रचार नहीं किया ताकि हर कोई इसमें शामिल हो सके। इसके बजाय, ऐसा लगा कि केवल कुछ खास राजनीतिक समूहों से जुड़े लोगों को ही साइन-अप करने के लिए प्रोत्साहित किया गया। इससे यह डर पैदा हो गया कि इकट्ठा किया गया डेटा वास्तविक कल्याणकारी योजना के बजाय “वोटर प्रोफाइलिंग” के लिए इस्तेमाल किया जाएगा।


2026 के चुनावों से पहले एक बड़ा झटका

सर्वे के समय (timing) ने इसे और भी विवादित बना दिया। केरल 2026 के विधानसभा चुनावों के लिए तैयार हो रहा है। ऐसे संवेदनशील समय में, राज्य द्वारा वित्तपोषित डोर-टू-डोर सर्वे को आसानी से एक चुनावी हथियार के रूप में देखा जा सकता है। अदालत ने इस बात पर भी संदेह जताया कि क्या सरकार के पास डेटा का अध्ययन करने का समय भी होगा।

अगर सर्वे फरवरी के अंत में खत्म होता है और चुनाव कुछ ही हफ्तों बाद हैं, तो सरकार फीडबैक का इस्तेमाल कैसे करेगी? अदालत ने सुझाव दिया कि यह सर्वे डेटा विश्लेषण से ज्यादा मतदाताओं तक पहुंचने का एक जरिया था। इस टिप्पणी ने कांग्रेस और भाजपा जैसे विपक्षी दलों को सरकार पर हमला करने का मौका दे दिया है। वे अब सरकार पर पार्टी के काम के लिए “बेशर्मी से सार्वजनिक धन का उपयोग” करने का आरोप लगा रहे हैं।


सरकार की प्रतिक्रिया और आगे की राह

एलडीएफ (LDF) सरकार इस मामले पर चुप नहीं बैठी है। कानून मंत्री पी. राजीव ने कहा कि अदालत के फैसले में “बिजनेस रूल्स” से जुड़े तकनीकी मुद्दे शामिल हैं। उन्होंने तर्क दिया कि सरकार को नागरिकों तक पहुंचने का पूरा अधिकार है। राज्य सरकार ने तुरंत हाई कोर्ट के आदेश को चुनौती देने के लिए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है।

उनका मानना है कि हाई कोर्ट ने नीतिगत निर्णय (policy decision) में बहुत अधिक हस्तक्षेप किया है। उनका तर्क है कि फीडबैक लेना एक सामान्य प्रशासनिक कार्य है। हालांकि, हाई कोर्ट का फैसला फिलहाल लागू है। सर्वे को आधिकारिक तौर पर रद्द कर दिया गया है। इसका मतलब है कि सरकार इस पर अब एक रुपया भी खर्च नहीं कर सकती। वे इस विशेष कार्यक्रम के लिए लोगों के घरों में और स्वयंसेवक भी नहीं भेज सकते।


निष्कर्ष: शासन और कानून का एक सबक

केरल का यह “यू-टर्न” हर किसी के लिए एक बड़ा सबक है। यह दिखाता है कि एक शक्तिशाली सरकार को भी देश के नियमों का पालन करना चाहिए। जनता का पैसा जनता का ही है, और इसे पूरी पारदर्शिता के साथ खर्च किया जाना चाहिए। केरल हाई कोर्ट ने एक स्पष्ट संदेश दिया है: राजनीतिक सुविधा के लिए नियमों की अनदेखी नहीं की जा सकती।

अब यह मामला सुप्रीम कोर्ट में है, और पूरा देश इस पर नजर गड़ाए हुए है। क्या सर्वे को दोबारा शुरू करने की अनुमति दी जाएगी, या यह “नव केरल” का अंतिम अंत है? यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा। फिलहाल, यह विशाल नागरिक सर्वेक्षण सरकार के लिए एक अधूरा सपना और कानूनी जवाबदेही चाहने वालों के लिए एक जीत बना हुआ है।

खुशालाल प्रजापति द्वार लिखा गया।

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