प्रकाशित समय : सुबह
नई दिल्ली: उत्तर भारत में इस साल सर्दियों का मौसम अपने सामान्य मिजाज से काफी अलग नजर आ रहा है। पहाड़ों पर बर्फबारी की कमी और मैदानी इलाकों में सूखे जैसे हालात ने वैज्ञानिकों और आम जनता दोनों की चिंता बढ़ा दी है। ताज़ा मौसम वैज्ञानिक विश्लेषणों के अनुसार, इसका सबसे बड़ा कारण ‘पश्चिमी विक्षोभ’ (Western Disturbances) का लगातार कमजोर पड़ना है, जिसके पीछे कहीं न कहीं बढ़ता ‘ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन’ जिम्मेदार है।
पहाड़ों पर सूखा और मैदानों में प्रदूषण का वार
आमतौर पर दिसंबर और जनवरी के महीने में जम्मू-कश्मीर, लद्दाख, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के पहाड़ बर्फ की सफेद चादर से ढके रहते हैं। लेकिन इस साल यहाँ बर्फबारी में भारी गिरावट दर्ज की गई है। यही हाल दिल्ली, हरियाणा और पंजाब जैसे मैदानी राज्यों का है, जहाँ सर्दियों की बारिश नदारद रही।

बारिश न होने का खामियाजा दिल्ली-एनसीआर के लोगों को जहरीली हवा के रूप में भुगतना पड़ रहा है। जानकारों का कहना है कि पर्याप्त वर्षा के अभाव में वातावरण में मौजूद प्रदूषक तत्व (Pollutants) धुल नहीं पाए, जिससे स्मॉग और प्रदूषण का स्तर लंबे समय तक खतरनाक बना रहा।
वैज्ञानिक कारण: जेट स्ट्रीम में बदलाव
मौसम विभाग के विशेषज्ञों के अनुसार, भूमध्य सागर से नमी लेकर आने वाले पश्चिमी विक्षोभ इस बार बहुत कमजोर रहे। इसके पीछे मुख्य वजह ‘सबट्रॉपिकल वेस्टरली जेट स्ट्रीम’ की स्थिति में बदलाव को माना जा रहा है।
- यह जेट स्ट्रीम अपनी सामान्य जगह से खिसक कर उत्तर-पूर्व की ओर चली गई है।
- इसके परिणामस्वरूप, विक्षोभ (Disturbances) भारतीय क्षेत्रों में सक्रिय नहीं हो पा रहे हैं।
- ग्रीनहाउस गैसों के बढ़ते प्रभाव से वायुमंडल की ऊपरी परतों में तापमान बढ़ रहा है, जो इन विक्षोभों की तीव्रता को कम कर रहा है।
खेती और रबी की फसलों पर खतरा
इस मौसमी बदलाव का सबसे गंभीर असर कृषि क्षेत्र पर पड़ सकता है। उत्तर भारत में रबी की फसलें, विशेषकर गेहूं, सर्दियों की बारिश (जिसे ‘मावट’ भी कहा जाता है) पर काफी हद तक निर्भर करती हैं। बारिश की कमी और बढ़ते तापमान के कारण फसलों की पैदावार प्रभावित होने की आशंका है, जो भविष्य में खाद्य सुरक्षा के लिए एक चुनौती बन सकती है।
जलवायु परिवर्तन की आहट
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि कार्बन उत्सर्जन पर लगाम नहीं लगाई गई, तो आने वाले वर्षों में पश्चिमी विक्षोभ की आवृत्ति और तीव्रता में और भी कमी आ सकती है। अब मानसून की बारिश अक्टूबर तक खिंच रही है, जबकि कड़ाके की ठंड का समय सिकुड़ता जा रहा है। यह सब ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन के स्पष्ट संकेत हैं।
निष्कर्ष: पश्चिमी विक्षोभ का कमजोर पड़ना केवल एक मौसमी घटना नहीं है, बल्कि यह प्रकृति की ओर से एक चेतावनी है। पर्यावरण के प्रति बढ़ती लापरवाही आने वाले समय में उत्तर भारत के जल चक्र और कृषि तंत्र को पूरी तरह अस्त-व्यस्त कर सकती है।
खुशालाल प्रजापति द्वार लिखा गया।
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