ख़ामेनेई की मौत के बाद कैसे चल रहा है ईरान का शासन?

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प्रकाशित समय : सुबह

एक युग का अंत

28 फ़रवरी 2026 की रात ईरान और पूरी दुनिया के लिए एक ऐतिहासिक मोड़ बन गई। अमेरिका और इज़रायल के संयुक्त हवाई हमले में ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई की मौत हो गई। 86 साल के ख़ामेनेई अपने आवास के दफ़्तर में थे, जब यह हमला हुआ। 1989 से ईरान की सत्ता पर काबिज़ ख़ामेनेई के जाने के बाद इस्लामी गणराज्य अब अपने सबसे बड़े संकट का सामना कर रहा है।


तीन सदस्यीय अंतरिम परिषद की बागडोर

ईरान के संविधान के अनुच्छेद 111 के तहत, जब तक नया सर्वोच्च नेता नहीं चुना जाता, एक अस्थायी नेतृत्व परिषद देश की बागडोर संभालती है। 1 मार्च को यह परिषद गठित की गई जिसमें तीन नाम शामिल हैं:

  • मसूद पेज़ेश्कियान — ईरान के राष्ट्रपति (उदारवादी)
  • ग़ुलाम-हुसैन मोहसेनी-ईजेई — सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश (कट्टरपंथी)
  • आयतुल्लाह अलीरज़ा अराफ़ी — गार्जियन काउंसिल के वरिष्ठ धर्मगुरु

विदेश मंत्री अब्बास अराग़ची ने कहा कि यह प्रक्रिया “एक या दो दिन” में पूरी हो सकती है, हालाँकि हालात उतने सरल नहीं हैं।

ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई की तस्वीर के सामने तेहरान की सड़कों पर जमा भीड़, पृष्ठभूमि में ईरानी झंडा।
ख़ामेनेई की मौत के बाद ईरान में कौन संभाल रहा है सत्ता की बागडोर? तीन सदस्यीय अंतरिम परिषद, IRGC की बढ़ती ताक़त और उत्तराधिकार का अनसुलझा सवाल — जानिए इस्लामी गणराज्य का भविष्य किस दिशा में जा रहा है।

IRGC की बढ़ती भूमिका

ख़ामेनेई की मौत के साथ ही कई अन्य वरिष्ठ नेता भी इस हमले में मारे गए, जिनमें उनके सुरक्षा सलाहकार अली शमखानी और रिवोल्यूशनरी गार्ड्स (IRGC) के कमांडर-इन-चीफ मोहम्मद पाकपौर शामिल हैं। इतने बड़े नेतृत्व शून्य को देखते हुए अब असली सत्ता IRGC के हाथों में जाती दिख रही है।

सुरक्षा प्रमुख अली लारिजानी को राष्ट्रीय सुरक्षा समन्वय की ज़िम्मेदारी सौंपी गई है। IRGC के क्षेत्रीय और प्रांतीय कमांडरों को पहले से ही आपातकालीन अधिकार दिए जा चुके थे, ताकि शीर्ष नेतृत्व के निष्क्रिय होने पर भी सैन्य कार्रवाई जारी रहे।


नया सर्वोच्च नेता कौन होगा?

संविधान के अनुसार, 88 वरिष्ठ धर्मगुरुओं की “विशेषज्ञ सभा” (Assembly of Experts) नए सर्वोच्च नेता का चुनाव करेगी। लेकिन 3 मार्च को क़ुम स्थित इस सभा के दफ़्तर पर भी हमला हो गया, जबकि वहाँ चुनाव की बैठक चल रही थी। इससे यह प्रक्रिया और उलझ गई है।

प्रमुख दावेदार:

अलीरज़ा अराफ़ी — गार्जियन काउंसिल के सदस्य, विशेषज्ञ सभा के उपाध्यक्ष और ईरानी मदरसा तंत्र के प्रमुख। ख़ामेनेई के करीबी माने जाते हैं। अंतरिम परिषद में होने से इनकी स्थिति मज़बूत है।

हसन ख़ुमैनी — इस्लामी क्रांति के संस्थापक आयतुल्लाह ख़ुमैनी के पोते। सुधारवादी छवि, IRGC के बीच भी सम्मान। हालाँकि वे कभी किसी सरकारी पद पर नहीं रहे।

मोहम्मद-मेहदी मिर्बाग़ेरी — अत्यंत रूढ़िवादी, विशेषज्ञ सभा के सदस्य।

मोजताबा ख़ामेनेई — मृत सर्वोच्च नेता के बेटे, IRGC से गहरे संबंध। लेकिन राजशाही की तरह पिता-पुत्र उत्तराधिकार से सत्ता में आना, 1979 की इस्लामी क्रांति की भावना के विरुद्ध माना जाएगा।

ट्रम्प ने ABC न्यूज़ को बताया कि अमेरिका के पास उत्तराधिकारियों की सूची थी — “लेकिन वे सब मारे जा चुके हैं। दूसरे और तीसरे नंबर के उम्मीदवार भी नहीं रहे।”

मौजूदा सरकार कब तक टिकेगी?

विशेषज्ञों की राय तीन संभावित रास्तों पर बंटी है:

1. शासन की निरंतरता (“ख़ामेनेई-इज़्म बिना ख़ामेनेई”) नया नेता पुरानी नीतियाँ ही जारी रखेगा। लेकिन वह “काम करते हुए सीखेगा” और आर्थिक-कूटनीतिक चुनौतियों से जूझेगा।

2. सैन्य अधिग्रहण IRGC, जो दशकों से ईरानी अर्थव्यवस्था और सुरक्षा दोनों पर हावी है, पर्दे के पीछे से सत्ता चलाने लगे।

3. शासन का पतन दिसंबर 2025 से चल रहे देशव्यापी विरोध-प्रदर्शन, आर्थिक तंगी और अब युद्धकालीन नेतृत्व शून्य — ये सब मिलकर इस्लामी गणराज्य की नींव हिला सकते हैं।

काउंसिल ऑन फ़ॉरेन रिलेशंस (CFR) ने चेतावनी दी है कि इनमें से कोई भी रास्ता निकट भविष्य में ईरान को स्थिरता या सुधार की दिशा में नहीं ले जाएगा।


ईरान के लोगों की प्रतिक्रिया

तेहरान में इन्क़लाब चौक पर हज़ारों लोग सरकार समर्थन में जमा हुए। दूसरी तरफ़, अमेरिका में बसे ईरानी इंजीनियर मसूद ग़ुद्रत-आबादी ने कहा — “यह मेरी ज़िंदगी का सबसे अच्छा दिन है। मुझे उम्मीद है यह लम्हा हमारे देश के लिए एक नए अध्याय की शुरुआत होगा।”


निष्कर्ष

ख़ामेनेई के जाने के बाद ईरान एक ऐसे चौराहे पर खड़ा है, जहाँ हर रास्ता अनिश्चितता से भरा है। चल रहे अमेरिका-इज़रायल हमले, नेतृत्व का खालीपन, विशेषज्ञ सभा पर हमला और घरेलू अशांति — ये सब मिलकर इस्लामी गणराज्य के अस्तित्व की सबसे बड़ी परीक्षा बन गए हैं। 1979 के बाद यह सिर्फ़ दूसरा नेतृत्व-परिवर्तन है — लेकिन इस बार हालात बिल्कुल अलग हैं।

खुशालाल प्रजापति द्वार लिखा गया।

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